Historical background

Nawabi Nagari 'Tonk' is famous not only in Rajasthan but also all over India for its historical legends. As per the history, Jaipur's King Man Singh conquered Tari & Tokra Janpad in the regime of Akbar. In the year 1643, twelve villages of Tokra janpad was given to Bhola Brahmin. Later Bhola gave a name to these twelve villages as 'Tonk'.

The history of Tonk is very old as it is connected with Bairath culture & civilization. Tonk has been called ‘Rajasthan ka Lucknow’, ‘Adab ka Gulshan’, ‘Romantic poet Akhtar Shreerani ki Nagri’, ‘Meethe Kharboojo ka Chaman’, and ‘Hindu Muslim Ekta ka Maskan’ . These names designate Tonk a significant status in Rajasthan.

It is known as SAMWAD LAKSHYA in Mahabharat period. In the regime of Mouryas, it is under Mauryas then it was merged in to Malvas. Most of the part was under Harsh Vardhan. As per HEVAN SANG, tourist of China, it was under Bairath State. In the regime of Rajputs, the parts of this state were under Chavras, Solankis, Kachvahs, Sisodiyas and Chouhans. Later, it was under the regime of King Holkar and Sindhia.

In 1806, Amir Khan conquered it from Balvant Rao Holkar. Later, British government gained it from Amir Khan. As per the treaty of 1817, British government returned it to Amir Khan. On 25th March 1948, when Nawab Mohd. Ismile Ali Khan was the ruler; Tonk was merged into Rajasthan including an area of Tonk and Aligarh Tehsils of old Tonk State with Newai, Malpura, Toda Raisingh and Uniara of Jaipur State, Deoli of Ajmer, Marwar and 27 villages of Bundi.

 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

 

प्राचीन अभिलेख के अनुसार सम्राट अकबर के शासन काल में जयपुर रियासत के राजा मानसिंह ने टोरी और टोकरा परगना को अपने अधिकार में ले लिया था। सन् 1643 में राजा मानसिंह ने भोला नाम के ब्राह्मण को टोकरा के 12 गाँव भूमि के रूप में स्वीकृत किए गए जिसने इन ग्रामों के समूह को मिलाकर टोंक का नामकरण किया। बाद में जयपुर के राजा सवाई जयसिंह से मानसिंह सोलंकी को सौप दिया, जिसकी बहन से राजा सवाई जयसिंह ने शादी की थी। सन् 1720 में इस जागीर को पुनः समाप्त कर दिया गया। सन् 1750 में जयपुर के महाराज माधोसिंह ने टोंक और रामपुरा को मलहरराव होलकर को सौंप दिया, पर कुछ समय बाद से इन जिलों के स्वामित्व पर होलकर, सिंधिया व जयपुर राजघरानों में विवाद चलता रहा। सन् 1804 में अंग्रेजो द्वारा टोंक व मालपुरा दोनो जिलों पर फतह कर लिया गया तथा टोंक जिले को जयपुर रियासत में दे दिया गया।

 

महाराज सवाई जयंसिह की मृत्यु पर ईश्वरी सिंह और माधोसिंह आमेर की गद्दी के लिए लड़ते रहे। माधोसिंह ने सम्वत् 1810 में टोंक में भीमगढ़ बनाकर भोमियां को दिया। महाराज माधोसिंह ने टोंक को परगना माधोराव होलकर को सहायता करने के बदले दे दिया जो अन्त में सम्वत् 1863 विक्रम तद्नुसार 1817 में नवाब अमीर खां को मिल गया। 1817 में अमीर खां के नवाब बनने के बाद टोंक एक इस्लामी रियासत में तब्दील हो गया इसमें टोंक शहर, अलीगढ, रामपुरा, सिरोज, छबड़ा और निम्बाहेड़ा के परगने शामिल कर दिए गए। लगातार लूट मार और कत्लोगार से तंग आकर अंग्रेज सरकार के सामने अमीर खां को टोंक का नवाब बनाने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहा था। नवाब अमीर खान ने टोंक के पुराने किला लालगढ़ को अमीरगढ़ में तब्दील कर दिया तथा 1834 तक टोंक को सजाने संवारने में व्यतीत किया। 1834 में उनकी मृत्य के पश्चात वज़िउद्दुल्ला टोंक के नवाब बने। इनकी शिक्षा देहली में हुई। अतः इनके समय में शिक्षा में प्रगति हुई। जामा मस्जिद का निर्माण हुआ। नजरबाग का विस्तार हुआ। 1865 से 1867 स्वयं मो. अली टोंक के नवाब रहे, इन्हे अल्प समय में ही अंग्रेजों द्वारा गद्दी से उतार कर बनारस भेज दिया गया थाक्योंकि इन्होंने सुलह समझौते के बहाने लावा के ठाकरों को बुलाकर  धोखे से कत्ल करवा डाला था। 1867 में अल्पायु में ही इब्राहीम अली खां टोंक के नवाब बने। यह समय बहुत लम्बा चला और शासकों का समय था। तरह-तरह के मजमें, मुशायरे,  दंगल इस वक्त की शान थी। 1930 में सआदत अली खां टोंक के नवाब बने। यह तरक्की पसन्द व्यक्ति थे। इनके समय में फ्रेजर पुल का निर्माण हुआ। सआदत अस्पताल और धण्टाघर बना तथा पैवेलियन का निर्माण हुआ। 1947 में इनके निधन के पश्चात् फारूख अली खां नवाब बने। इनका कार्यकाल 31 मई 1947 से लेकर 7 जनवरी 1948 तक रहा। इस बीच भारत देश स्वतंत्र हो गया। फरवरी 1948 में मों. इस्माईल अली खां नवाब बने तथा टोंक के प्रशासक रामबाबू सक्सैना नियुक्त किए गए। मई 1948 में टोंक राजस्थान यूनियन में शामिल हो गया जिसमें 11 रियासतें   और शामिल थी। नवाब साहब का तीस हजार रूपये महीने का मेहनताना  तय हो गया, तथा इस प्रकार 131 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात् टोंक पर नवाबी हुकुमत समाप्त हो गई। आखिर नवाब इस्माइल अली खां जिसकी दिलचस्पियाँ शिकार और खेल तक सीमित थी, 1974 तक जीवित रहे।

 

वर्तमान में टोंक जिला प्राचीन टोंक रियासत अलीगढ़ तहसील, जयपुर राज्य की निवाई, मालपुरा एवं टोडारायसिंह तहसील तथा उनियारा ठिकाना अजमेर मेवाड़ के देवली व बून्दी के 27 ग्रामों को मिलाकर बनाया गया है।